भारत की सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने दो बड़े करार किए हैं। इनका असर देश की दो अहम सैन्य क्षमताओं पर पड़ने वाला है। एक तरफ आसमान में सैन्य अभियानों के दौरान संचार को मजबूत करने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ समुद्र के भीतर छिपे दुश्मन के खतरों से निपटने की क्षमता बढ़ाने पर जोर है।
15 अक्टूबर 2026 को ये दोनों करार वायुसेना और नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता मजबूत करने के लिए किए गए हैं। दोनों करार भारत की स्वदेशी रक्षा विनिर्माण क्षमता को बढ़ावा देने की दिशा में अहम हैं। इससे एक ओर भारतीय वायुसेना के लिए स्वदेशी संचार उपग्रह की खरीद का रास्ता आगे बढ़ेगा, तो दूसरी और नौसेना के लिए हेवीवेट टॉरपीडो की सप्लाई होगी।
क्या है पूरी डील ?
जो दो करार हुए हैं, उनका कुल मूल्य ₹4,106 करोड़ बताया गया है। करारों की खासियत यह है कि वे दो अलग-अलग जरूरतों को पूरा करती हैं।
- इसमें से 2,563 करोड़ रुपये वायुसेना को GSAT-7C सैटेलाइट के लिए है। इसका करार न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL), बेंगलुरु के साथ हुआ है।
- और 1,543 करोड़ रुपये नौसेना को वरुणास्त्र टॉरपीडो के लिए है। इसक करार भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL), हैदराबाद के साथ किया गया।
इन बातों को चार्ट से एक नजर में इस तरह भी समझा जा सकता है–
| परियोजना | GSAT-7C | वरुणास्त्र |
| सेवा | भारतीय वायुसेना | भारतीय नौसेना |
| प्रमुख भूमिका | सुरक्षित सैन्य संचार | पनडुब्बी रोधी युद्ध |
| अनुबंध मूल्य | ₹2,563 करोड़ | ₹1,543 करोड़ |
| कंपनी | न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड | भारत डायनेमिक्स लिमिटेड |
| विकास/तकनीकी आधार | स्वदेशी डिजाइन, विकास और निर्माण | DRDO की NSTL द्वारा विकसित स्वदेशी टॉरपीडो |
GSAT-7C वायुसेना के लिए कितना अहम ?
GSAT-7C भारतीय वायुसेना के लिए सिर्फ एक संचार उपग्रह नहीं, बल्कि लड़ाकू विमानों और जमीन पर मौजूद सैन्य इकाइयों के बीच सुरक्षित संपर्क मजबूत करने वाली अहम क्षमता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि वायुसेना को अपने सैन्य अभियानों के लिए समर्पित सैटेलाइट संचार व्यवस्था मिलेगी।
दरअसल आधुनिक युद्ध में केवल लड़ाकू विमान, मिसाइल और रडार ही निर्णायक नहीं होते। विमानों, कमांड सेंटरों और अन्य सैन्य परिसंपत्तियों के बीच समय पर और सुरक्षित सूचना का आदान-प्रदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी अभियान के दौरान संचार बाधित हो जाए या सूचनाएं समय पर न पहुंचें, तो ऑपरेशन के समन्वय पर असर पड़ सकता है।
इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए भारतीय वायुसेना के लिए GSAT-7C संचार उपग्रह की परियोजना महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे वायुसेना के सैन्य संसाधनों के बीच सुरक्षित और भरोसेमंद संपर्क को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
स्वदेशी रूप से डिज़ाइन, विकसित और निर्मित यह उपग्रह भारतीय वायु सेना की संपत्तियों के लिए सुरक्षित, लचीली और निर्बाध संचार क्षमताओं को बढ़ाएगा, जिससे उनकी Operational effectiveness मजबूत होगी।
GSAT-7C संचार उपग्रह डील और खासियत एक नजर में-
| तकनीकी विवरण | जानकारी |
|---|---|
| उपग्रह का नाम | GSAT-7C |
| प्रकार | सैन्य संचार उपग्रह |
| प्रमुख उपयोगकर्ता | भारतीय वायुसेना |
| अनुबंध की कीमत | ₹2,563 करोड़ |
| अनुबंधित कंपनी | न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) |
| डिजाइन, विकास और निर्माण | स्वदेशी |
| प्रमुख उद्देश्य | वायुसेना के लिए सुरक्षित, मजबूत और निर्बाध संचार क्षमता विकसित करना |
| संचार क्षमता | लाइन-ऑफ-साइट से परे संचार (BLOS) को सक्षम बनाने का लक्ष्य |
| अनुमानित उपलब्धता | 2030 तक उपलब्ध होने की मीडिया रिपोर्ट; आधिकारिक पुष्टि जरूरी |
| कक्षा, वजन, ट्रांसपोंडर और फ्रीक्वेंसी बैंड | विस्तृत तकनीकी जानकारी सार्वजनिक रूप से पुष्ट नहीं |
GSAT-7C की स्वदेशी अंतरिक्ष तकनीक और विकास से जुड़ी प्रमुख भूमिका ISRO की बताई गई है। हालांकि, रक्षा मंत्रालय की घोषणा में उपग्रह की कक्षा, प्रक्षेपण की तारीख, तकनीकी बैंड, डेटा क्षमता या उसके संचालन में शामिल विशिष्ट प्लेटफॉर्म का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।
दूसरा करार यानी वरुणास्त्र क्या है?
वरुणास्त्र भारतीय नौसेना का स्वदेशी हेवीवेट एंटी-सबमरीन टॉरपीडो है, जिसे समुद्र के भीतर छिपी दुश्मन की पनडुब्बियों को निशाना बनाने के लिए विकसित किया गया है। इसे DRDO की विशाखापत्तनम स्थित नौसेना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला (NSTL) ने विकसित किया है, जबकि इसका उत्पादन भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) करती है।
- इस हथियार को भारतीय नौसेना में 29 जून 2016 को शामिल किया गया था। यह जहाज से दागा जाता है।
- इसके बाद जून 2023 में इसका परीक्षण विस्फोटक वारहेड के साथ किया गया, जिसमें इसने पानी के भीतर निर्धारित लक्ष्य को सफलतापूर्वक निशाना बनाया।
वरुणास्त्र की खासियत यह है कि यह गहरे और उथले, दोनों तरह के पानी में काम कर सकता है और दुश्मन की शांत पनडुब्बियों को भी ट्रैक कर उन्हें निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है।
इसकी खूबियां एक नजर में –
| विवरण | जानकारी |
| हथियार का प्रकार | हेवीवेट एंटी-सबमरीन टॉरपीडो |
| विकासकर्ता | DRDO की NSTL, विशाखापत्तनम |
| उत्पादन | भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) |
| नौसेना में शामिल | 29 जून 2016 |
| लॉन्च प्लेटफॉर्म | टॉरपीडो दागने में सक्षम युद्धपोत |
| लंबाई | लगभग 7.78 मीटर |
| व्यास | 533.4 मिलीमीटर |
| वजन | अभ्यास संस्करण लगभग 1,605 किलोग्राम; युद्धक संस्करण लगभग 1,850 किलोग्राम |
| गति | 27 और 40 नॉट के विकल्प |
| संचालन की गहराई | 8 से 600 मीटर |
| दिशा और लक्ष्य पहचान | ध्वनिक होमिंग प्रणाली और एडवांस नेविगेशन |
| प्रमुख भूमिका | दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाकर उन्हें निशाना बनाना |
| स्वदेशी सामग्री | 2016 में रक्षा मंत्री ने लगभग 95% स्वदेशी सामग्री का उल्लेख किया था |
ध्वनिक होमिंग प्रणाली (Acoustic Homing System) – इसका मतलब है ऐसी तकनीक, जो पानी के भीतर ध्वनि के संकेतों की मदद से दुश्मन की पनडुब्बी का पता लगाती है और टॉरपीडो को उसकी दिशा में आगे बढ़ने में मदद करती है। पानी के भीतर पनडुब्बी के इंजन, प्रोपेलर और दूसरी गतिविधियों से ध्वनि पैदा होती है।
नौसेना के लिए कितना अहम वरुणास्त्र ?
हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री मार्गों, नौसैनिक ठिकानों और महत्वपूर्ण समुद्री गतिविधियों की सुरक्षा भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम है। पनडुब्बियां समुद्र के भीतर छिपकर काम कर सकती हैं और सतह पर मौजूद जहाजों के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। ऐसे में पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता किसी भी आधुनिक नौसेना के लिए महत्वपूर्ण है।
पनडुब्बी रोधी अभियान में केवल टॉरपीडो ही नहीं, बल्कि सोनार, निगरानी प्रणालियों, हेलीकॉप्टरों, समुद्री गश्ती विमानों और युद्धपोतों के बीच तालमेल भी अहम होता है। वरुणास्त्र इस व्यापक सैन्य व्यवस्था में दुश्मन की पनडुब्बियों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाने वाला एक प्रमुख हथियार है।
जहाज से दागे जाने वाले हेवीवेट टॉरपीडो की मदद से नौसेना के युद्धपोत पानी के भीतर मौजूद संभावित खतरे को निशाना बना सकते हैं। वरुणास्त्र की स्वदेशी उपलब्धता से भारत को इस महत्वपूर्ण हथियार प्रणाली के निर्माण और आपूर्ति में घरेलू औद्योगिक क्षमता का लाभ मिलता है।
भारतीय नौसेना के प्रमुख टॉरपीडो
भारतीय नौसेना पनडुब्बियों का मुकाबला करने और समुद्र के भीतर दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाने के लिए अलग-अलग श्रेणियों के टॉरपीडो इस्तेमाल करती है। इनमें स्वदेशी हथियारों के साथ विदेशी मूल के टॉरपीडो भी शामिल हैं। इनकी भूमिका और इन्हें दागने वाले प्लेटफॉर्म अलग-अलग हैं।
| टॉरपीडो | प्रकार और प्रमुख भूमिका |
|---|---|
| वरुणास्त्र (Varunastra) | भारत में विकसित हेवीवेट टॉरपीडो। इसे युद्धपोतों से दागकर दुश्मन की पनडुब्बियों को निशाना बनाया जा सकता है। इसे DRDO की नौसेना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला (NSTL) ने विकसित किया है और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) इसका उत्पादन करती है। |
| TAL / श्येना (Shyena) | स्वदेशी हल्का टॉरपीडो, जिसे पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए विकसित किया गया है। हल्के टॉरपीडो का इस्तेमाल संबंधित नौसैनिक प्लेटफॉर्म की क्षमता के अनुसार किया जाता है। |
| Mk 54 | अमेरिकी मूल का हल्का टॉरपीडो। भारत ने इसे P-8I समुद्री निगरानी एवं पनडुब्बी रोधी विमानों के लिए खरीदा है। |
| SUT 264 | जर्मन मूल का हेवीवेट टॉरपीडो, जिसका भारतीय नौसेना की पनडुब्बियों में इस्तेमाल रिपोर्ट किया गया है। इसकी वर्तमान परिचालन स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। |
| F21 | फ्रांसीसी मूल का हेवीवेट टॉरपीडो। भारतीय स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियों के लिए इसके चयन और आपूर्ति से जुड़ी रिपोर्टें सामने आई हैं, लेकिन इसकी मौजूदा तैनाती को लेकर निश्चित दावा करने से पहले आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। |
GSAT-7C से पहले वायुसेना किन संचार उपग्रहों का इस्तेमाल करती है?
भारतीय वायुसेना के पास GSAT-7C से पहले भी सैन्य संचार के साधन और सैटेलाइट आधारित संचार क्षमताएं मौजूद हैं। इनमें GSAT-7A खास है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 19 दिसंबर 2018 को लॉन्च किया था। ISRO के अनुसार, यह उपग्रह भारतीय क्षेत्र में Ku-बैंड के जरिए संचार सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया है। हालांकि, GSAT-7A की सभी मौजूदा सैन्य सेवाओं और उपयोगकर्ताओं का विस्तृत ब्योरा सार्वजनिक नहीं है।
रक्षा मंत्रालय ने नवंबर 2021 में GSAT-7C और उससे जुड़े ग्राउंड हब की परियोजना को प्रारंभिक मंजूरी दी थी। इसका उद्देश्य सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो (SDR) के लिए रियल-टाइम कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना और सशस्त्र बलों के बीच सुरक्षित, लाइन-ऑफ-साइट से परे संचार क्षमता बढ़ाना था। इसके बाद 15 अक्टूबर 2026 को GSAT-7C के लिए ₹2,563 करोड़ का अनुबंध किया गया।








