शीत युद्ध के दौर में एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे पाकिस्तान और रूस के बीच भू-राजनीतिक (Geopolitical) समीकरण-संबंध तेजी से बदल रहे हैं ? रूस के गृह मंत्री व्लादिमीर कोलोकोल्त्सेव (Vladimir Kolokoltsev) चार दिवसीय आधिकारिक दौरे पर पाकिस्तान पहुंचे हैं। इन दोनों देशों के संबंधों के इतिहास में यह पहली बार है जब रूस का कोई गृह मंत्री पाकिस्तान के दौरे पर है।
पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी (Mohsin Naqvi) के विशेष न्योते पर हो रही यह यात्रा दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों में एक बड़ा मोड़ बताई जा रही है। व्लादिमीर कोलोकोल्त्सेव के इस्लामाबाद पहुंचने पर राज्य मंत्री (गृह) तलाल चौधरी ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।
पाकिस्तानी गृह मंत्रालय ने इस ऐतिहासिक घटनाक्रम पर आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि “रूस-पाकिस्तान संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत हो रही है।”
एक ऐसे समय में जब वैश्विक राजनीति गुटों में बंट रही है, रूस के आंतरिक सुरक्षा और पुलिस तंत्र के प्रमुख का पाकिस्तान आना रक्षा विश्लेषकों के बीच गहरी चर्चा का विषय बन गया है।
भारत के लिए भी इस घटनाक्रम पर नजर रखना जरूरी है, क्योंकि रूस लंबे समय से भारत का प्रमुख रक्षा और रणनीतिक साझेदार रहा है, जबकि मॉस्को और इस्लामाबाद के संबंध भी पिछले कुछ सालों में आगे बढ़े हैं।
रूसी गृह मंत्री की पाकिस्तान यात्रा का क्या है पूरा मामला?
12 अक्टूबर 2026 को रूसी गृह मंत्री व्लादिमीर कोलोकोल्त्सेव (Vladimir Kolokoltsev) इस्लामाबाद पहुंचे। यह यात्रा केवल दो मंत्रियों की मुलाकात तक सीमित नहीं है।
- इसके पीछे आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, मादक पदार्थों की तस्करी रोकने, साइबर अपराध से निपटने और अफगानिस्तान से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर समन्वय बढ़ाने की कोशिश है।
- इसके अलावा पुलिस सहयोग यानी पुलिस प्रशिक्षण, सूचनाओं के आदान-प्रदान और कानून-व्यवस्था से जुड़े अनुभव साझा करने की पहल की भी संभावना है।
- वह पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व से भी मुलाकात करेंगे। यात्रा के दौरान दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने और आपसी सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होगी।
पाकिस्तान-रूस संबंधों में किस तरह की बढ़ रही नजदीकी ?
इस यात्रा को नया अध्याय बताने, रिश्तों में नजदीकी बढ़ने के पीछे चार प्रमुख वजहें दिखती हैं—आंतरिक सुरक्षा सहयोग, अफगानिस्तान से जुड़े साझा सुरक्षा हित, पहले से बढ़ते आर्थिक एवं राजनयिक संबंध और बदलता वैश्विक समीकरण।
1-आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा पर सहयोग–
जुलाई 2026 में न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में मोहसिन नकवी और कोलोकोल्त्सेव की मुलाकात हुई थी। उस बैठक में दोनों देशों ने आतंकवाद-रोधी कार्रवाई, मादक पदार्थों की तस्करी पर रोक, साइबर अपराध से निपटने और पुलिस के संयुक्त अभ्यास जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की थी। उसी बैठक में नकवी ने रूसी मंत्री को पाकिस्तान आने का निमंत्रण दिया था।
इसलिए अक्टूबर की यात्रा अचानक हुई कूटनीतिक पहल नहीं, बल्कि पहले से चल रही बातचीत को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
2- अफगानिस्तान से जुड़े सुरक्षा हित–
पाकिस्तान और रूस, दोनों के लिए अफगानिस्तान की सुरक्षा स्थिति महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की जमीन से सक्रिय आतंकवादी संगठन उसके यहां हमले करते हैं। दूसरी ओर, रूस भी अफगानिस्तान से जुड़े आतंकवादी नेटवर्क और मध्य एशिया में अस्थिरता फैलने की आशंका को लेकर चिंतित है।
इस साझा चिंता से दोनों देशों के बीच खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान और आतंकवाद-रोधी समन्वय की संभावनाएं बनती हैं।
3- आर्थिक और राजनयिक संबंधों को विस्तार–
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच रूस ने अपने ऊर्जा निर्यात के लिए नए बाजार तलाशे। दूसरी ओर, पाकिस्तान ने अपनी ऊर्जा जरूरतों और आयात लागत को ध्यान में रखते हुए रूसी कच्चे तेल की खरीद शुरू की। पाकिस्तान ने 2023 में रूसी कच्चे तेल को अपने ऊर्जा आयात में शामिल किया।
4- बदलता वैश्विक समीकरण-
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) रूस और पाकिस्तान को क्षेत्रीय मुद्दों पर बातचीत का मंच देता है। मॉस्को के लिए पाकिस्तान के साथ संबंध बढ़ाना दक्षिण एशिया में अतिरिक्त कूटनीतिक और आर्थिक विकल्प उपलब्ध कराता है
भारत के लिए इसके क्या मायने ?
रूसी मंत्री की यात्रा को पाकिस्तान अपने कूटनीतिक संबंधों के विस्तार तथा रूस के साथ सुरक्षा सहयोग मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में पेश कर रहा है। रूस और पाकिस्तान के संबंधों में सुधार जरूर दिखाई दे रहा है, लेकिन इसे भारत-रूस संबंधों के विकल्प के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।
भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग का इतिहास और संस्थागत आधार काफी व्यापक है। दोनों देशों के संबंधों का मूल्यांकन किसी एक यात्रा के आधार पर नहीं, बल्कि रक्षा सौदों, सैन्य तकनीक, ऊर्जा सहयोग और उच्चस्तरीय कूटनीतिक संपर्कों के व्यापक संदर्भ में किया जाना चाहिए।
रूस और भारत के बीच दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी है। रक्षा उपकरणों, सैन्य तकनीक, मिसाइल प्रणालियों और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के व्यापक संबंध रहे हैं।
वहीं, रूस अब पाकिस्तान के साथ भी अपने संबंधों का विस्तार कर रहा है। भारत के लिए इस घटनाक्रम को रूस की व्यापक क्षेत्रीय नीति में किसी संभावित बदलाव के रूप में समझना अधिक उचित होगा। आने वाले समय में असली संकेत यात्रा के दौरान होने वाली घोषणाओं, प्रस्तावित समझौतों और उनके वास्तविक क्रियान्वयन से मिलेंगे।
दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर सहयोग की गुंजाइश है। रूस को नए बाजारों और क्षेत्रीय संपर्कों से लाभ हो सकता है, जबकि पाकिस्तान आर्थिक और कूटनीतिक विकल्प बढ़ाना चाहता है।
यह दौरा इस बात का एक प्रमुख संकेत है कि मास्को अब अपनी दक्षिण एशिया नीति को केवल भारत के चश्मे से नहीं देख रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद लगे पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस नए बाजारों और भू-राजनीतिक भागीदारों की तलाश में है, और पाकिस्तान इस खांचे में पूरी तरह फिट बैठता है।
यानी भारत की इन कुछ बातों पर विशेष रूप से नजर होनी चाहिए-
1. रूस की दक्षिण एशिया नीति पर नजर–
मॉस्को अब पाकिस्तान के साथ भी आर्थिक, ऊर्जा और सुरक्षा संबंधों को आगे बढ़ा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि रूस दक्षिण एशिया में अपने संपर्कों को व्यापक बनाने की कोशिश कर रहा है।
सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि रूस का पाकिस्तान के करीब जाना भारत के ‘वेस्टर्न टिल्ट’ (पश्चिमी देशों और क्वाड की तरफ झुकाव) का जवाब हो सकता है, जिसके जरिए रूस भारत को संदेश देना चाहता हो कि वह दक्षिण एशिया में अपने विकल्पों को खुला रख सकता है
2. आतंकवाद और अफगानिस्तान पर रूस का रुख –
यदि रूस और पाकिस्तान आतंकवाद-रोधी सहयोग बढ़ाते हैं, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश आतंकवादी संगठनों की पहचान, सीमा-पार गतिविधियों और अफगानिस्तान से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर किस तरह का रुख अपनाते हैं।
3. खुफिया और आंतरिक सुरक्षा सहयोग के परिणाम पर नजर–
यदि भविष्य में दोनों देशों के बीच खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान या सुरक्षा एजेंसियों के नियमित सहयोग को लेकर ठोस समझौते होते हैं, तो भारत को उनके दायरे और प्रभाव का आकलन करना होगा। फिलहाल, इस यात्रा से भारत के खिलाफ किसी विशेष सुरक्षा व्यवस्था या संयुक्त कार्रवाई की पुष्टि नहीं होती।
इसलिए भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि रूस-पाकिस्तान की नजदीकी केवल कूटनीतिक संपर्क तक रहती है या आगे चलकर किसी व्यापक सुरक्षा साझेदारी में बदलती है।
4. किसी संभावित रक्षा सहयोग पर नजर-
हापूर्व में रूस भारत की संवेदनशीलता के कारण पाकिस्तान को हथियार बेचने से बचता रहा है। रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा सैन्य आपूर्तिकर्ता है, लेकिन पिछले कुछ सालों में रूस और पाकिस्तान ने ‘द्रुज्बा’ (Friendship) श्रृंखला के तहत संयुक्त सैन्य अभ्यास किए हैं। नजर रखने वाली बात होगी कि पाकिस्तान-रूस संबंध इस दिशा में कहां तक जा रहे हैं।
शीत युद्ध में कैसे रहे रूस और पाकिस्तान के रिश्ते?
रूस और पाकिस्तान के संबंधों का इतिहास दोस्ताना नहीं रहा है। शीत युद्ध (1947–1991) के दौरान दोनों देश काफी हद तक विरोधी रणनीतिक खेमों में रहे। उस समय सोवियत संघ भारत के करीब था, जबकि पाकिस्तान ने अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी सुरक्षा गठबंधनों के साथ साझेदारी की। हालांकि, यह कहना गलत होगा कि मॉस्को और इस्लामाबाद के बीच उस पूरे दौर में कोई संपर्क ही नहीं था। दोनों ने समय-समय पर कूटनीतिक और आर्थिक संबंध बढ़ाने की कोशिश भी की। यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आज रूस-पाकिस्तान संबंधों में बढ़ते संपर्क को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
शीत युद्ध के दौरान रूस-पाकिस्तान संबंधों के प्रमुख पड़ाव-
| समय / दौर | संबंधों की स्थिति | प्रमुख घटनाक्रम |
| 1948 | औपचारिक कूटनीतिक संबंध | पाकिस्तान और सोवियत संघ के बीच 1 मई 1948 को राजनयिक संबंध स्थापित हुए। |
| 1950 का दशक | अमेरिका बनाम सोवियत संघ का रणनीतिक विभाजन | पाकिस्तान 1954 में SEATO और 1955 में बगदाद समझौते में शामिल हुआ, जो बाद में CENTO कहलाया। इससे पाकिस्तान पश्चिमी सुरक्षा खेमे के करीब आ गया। |
| 1965–1966 | सीमित कूटनीतिक सहयोग | सोवियत प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन ने भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 के युद्ध के बाद ताशकंद में मध्यस्थता की। जनवरी 1966 में ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर हुए। |
| 1972–1977 | संबंध सुधारने की कोशिश | जुल्फिकार अली भुट्टो ने मार्च 1972 में मॉस्को का दौरा किया। सोवियत संघ ने कराची स्टील मिल सहित औद्योगिक और ऊर्जा परियोजनाओं में तकनीकी सहायता दी। |
| 1979–1989 | गंभीर टकराव | अफगानिस्तान में सोवियत सैन्य हस्तक्षेप के बाद पाकिस्तान अफगान मुजाहिदीन के लिए प्रमुख समर्थन केंद्र बना। पाकिस्तान को अमेरिका और अन्य देशों से मदद मिली, जबकि सोवियत संघ के साथ तनाव बढ़ गया। |
| 1990–1991 | शीत युद्ध का अंत | सोवियत सेना 1989 में अफगानिस्तान से निकल गई और 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। इससे पुराने शीत युद्ध के समीकरण बदलने लगे। |








