भारतीय नौसेना के लिए नई अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों वाला Project 75(I) प्रोजेक्ट अब डील के लिए अंतिम चरण में पहुंचता दिख रहा है। जर्मनी ने साफ कर दिया है कि उसकी तरफ से इस समझौते के दस्तावेज और जरूरी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं। अब गेंद भारत के पाले में है।
भारत में जर्मनी राजदूत डॉ. जैस्पर वीक (Jasper Wieck) ने 23 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि जर्मन पक्ष भारत के साथ अगली पीढ़ी की पारंपरिक पनडुब्बियां बनाने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर करने को तैयार है। वीक ने कहा, “दस्तावेज़ों के लिहाज़ से इसे पहले ही अंतिम रूप दिया जा चुका है और जर्मनी की तरफ़ से इस पर सहमति बन गई है। अब भारत को अपनी आंतरिक प्रक्रियाएं पूरी करनी हैं।
उन्होंने आगे कहा कि जर्मनी कल ही इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार है। डील में असली महत्व इस बात का है कि इन्हें भारत में बनाया जाना है और जर्मनी से तकनीक हासिल करने की योजना है। यही वजह है कि यह सौदा भारतीय नौसेना के साथ-साथ देश की पनडुब्बी निर्माण क्षमता के लिए भी अहम माना जा रहा है।
मई 2026 में वित्त मंत्रालय से करीब ₹70,000 करोड़ के Project 75(I) प्रस्ताव को मंजूरी मिलने की खबर सामने आई थी। इसके बाद जर्मन कंपनी TKMS की ओर से दिए जाने वाले Technology Transfer पैकेज की डिटेल रिव्यू प्रक्रिया चली। जून 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक इस रिव्यू के पूरा होने के बाद प्रपोजल को अंतिम सरकारी मंजूरी के लिए Cabinet Committee on Security (CCS) के सामने भेजा जाना था
Project 75(I) डील में है क्या-क्या ?
Project 75(I) के तहत भारतीय नौसेना के लिए छह नई पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां (conventional attack submarines) बनाई जानी हैं। इसमें भारत की Mazagon Dock Shipbuilders Limited (MDL) और जर्मनी की ThyssenKrupp Marine Systems (TKMS) मिलकर काम करेंगी।
इस प्रोजेक्ट की और खास बातें एक नजर में:-
- निर्माण भारत में होगा।
- परियोजना में Technology Transfer महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- इन पनडुब्बियों में AIP(Air Independent Propulsion) क्षमता शामिल है।
- RFP (Request for Proposal) के अनुसार पहली पनडुब्बी में कम से कम 45% स्वदेशी सामग्री का लक्ष्य है, जिसे कार्यक्रम की छठी पनडुब्बी तक 60% तक ले जाने का प्रावधान है।
रक्षा मंत्रालय ने Project 75(I) के RFP में AIP, आधुनिक टॉरपीडो, मिसाइल और अत्याधुनिक countermeasure systems जैसी क्षमताओं का प्रावधान किया था। साथ ही परियोजना का उद्देश्य भारत में पनडुब्बी डिजाइन और निर्माण क्षमता को बढ़ाना था।
यही कारण है कि जर्मन राजदूत जैस्पर वीक ने भी इसे सिर्फ जर्मनी से पनडुब्बियां खरीदने का सौदा नहीं, बल्कि भारत में प्रोडक्शन और technology transfer वाली साझेदारी बताया है।
इन छह पनडुब्बियों में खास क्या होगा?
Project 75(I) की सबसे अहम तकनीकी विशेषताओं में AIP यानी Air Independent Propulsion शामिल है।
सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को बैटरियां चार्ज करने के लिए समय-समय पर स्नॉर्कलिंग करनी पड़ती है। इसमें पनडुब्बी पानी के अंदर रहती है, लेकिन हवा लेने वाली ट्यूब पानी की सतह के ऊपर आती है। इससे उसके छिपे रहने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
जबकि AIP इस जरूरत को कम करके पनडुब्बी को ज्यादा समय तक पानी के भीतर रहने में मदद करता है। इससे उसकी छिपकर ऑपरेशन करने की क्षमता बढ़ती है और बार-बार सतह के करीब आने की जरूरत कम होती है।
एक वाक्य में कहें तो AIP पनडुब्बी को बिना बाहर आए लंबे समय तक पानी के अंदर काम करने में मदद करता है।
इससे तीन बड़े फायदे मिलते हैं:-
- लंबे समय तक stealth में रहना
- दुश्मन की निगरानी से बचते हुए ज्यादा देर तक इलाके में बने रहना
- समुद्र में गश्त और combat mission के दौरान operational endurance बढ़ाना
Project 75(I) में fuel-cell बेस्ड AIP सहित आधुनिक सेंसर, हथियार और countermeasure systems की जरूरत रखी गई है।
MDL और TKMS की जोड़ी कैसे बनी?
Project 75(I) की कहानी काफी लंबी है। रक्षा मंत्रालय ने जुलाई 2021 में छह AIP-सक्षम पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण के लिए RFP जारी किया था। यह Strategic Partnership Model के तहत ऐसा बड़ा कार्यक्रम था, जिसमें विदेशी मूल उपकरण निर्माता और भारतीय रणनीतिक साझेदार के साथ देश में निर्माण पर जोर दिया गया।
तकनीकी मूल्यांकन के बाद MDL-TKMS की बोली आगे बढ़ी। दूसरी प्रमुख भारतीय-विदेशी जोड़ी L&T और स्पेन की Navantia थी, लेकिन उसकी बोली तकनीकी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं पाई गई।
तकनीकी मूल्यांकन और आगे की प्रक्रिया के बाद TKMS-MDL साझेदारी Project 75(I) की दौड़ में आगे बढ़ी और अंततः इसी जोड़ी के साथ अनुबंध वार्ता आगे चली।
सितंबर 2025 में TKMS ने खुद पुष्टि की थी कि उसने MDL के साथ Project 75(I) के लिए आधिकारिक अनुबंध वार्ता शुरू कर दी है। दोनों कंपनियों ने Concept Design Agreement से जुड़ा काम भी पूरा किया था।
कब मिलेंगी पनडुब्बियां ?
डील पर हस्ताक्षर होना कार्यक्रम की शुरुआत होगी। RFP के मुताबिक पहली पनडुब्बी की डिलीवरी कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के सात साल बाद का लक्ष्य रखती है। इसके बाद क्रमशः बाकी पनडुब्बियों की डिलीवरी होनी है। यानी अगर समझौता अब होता भी है, तो भारतीय नौसेना को सभी छह पनडुब्बियां तुरंत नहीं मिलने वाली हैं। डिजाइन, निर्माण, परीक्षण और डिलीवरी में कई साल लगेंगे।
नौसेना के लिए इसके रणनीतिक मायने?
भारत के लिए समुद्री क्षेत्र में पानी के नीचे की क्षमता लगातार महत्वपूर्ण हो रही है। Project 75(I) इसी व्यापक जरूरत का हिस्सा है।
नई पनडुब्बियों की खासियत केवल उनकी संख्या नहीं होगी। AIP, बेहतर स्टील्थ, आधुनिक सेंसर और हथियार प्रणालियों जैसी क्षमताएं इन्हें लंबे समय तक गुप्त रूप से ऑपरेशन करने के लिए महत्वपूर्ण बनाती हैं।
इसके अलावा, Project 75(I) भारत की मौजूदा Kalvari-class/Project 75 पनडुब्बियों के बाद अगली बड़ी पारंपरिक पनडुब्बी निर्माण कड़ी है। Project 75 के तहत MDL ने छह Kalvari-class पनडुब्बियां बनाई हैं।
भारत, चीन और पाकिस्तान की पनडुब्बी ताकत में कितना अंतर?
पनडुब्बियों की संख्या के लिहाज से भारत, चीन से काफी पीछे और पाकिस्तान से आगे है, लेकिन तीनों देशों के बेड़े की प्रकृति अलग है। चीन के पास बड़ी संख्या में conventional/AIP पनडुब्बियों के साथ परमाणु-powered attack और ballistic-missile submarines भी हैं। भारत के पास 16 conventional submarines के अलावा परमाणु SSBN क्षमता है, जो nuclear second-strike capability के लिए महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान के पास अभी छोटा conventional fleet है, लेकिन चीन से मिल रही Hangor-class AIP पनडुब्बियां उसकी underwater endurance और combat capability बढ़ा रही हैं।
| क्षमता | भारत | चीन | पाकिस्तान |
| कुल पनडुब्बियां | लगभग 18–20 | लगभग 60-70 | 8 |
| Conventional पनडुब्बियां | लगभग 16 | 50 के आसपास | 8 के आसपास |
| परमाणु पनडुब्बियां | SSBN मौजूद; SSN क्षमता अभी विकास में | SSBN + SSN/SSGN | नहीं |
| AIP क्षमता | Kalvari में अभी मूल रूप से नहीं; P-75(I) में AIP अनिवार्य | Yuan-class समेत बड़ी संख्या में AIP boats | Agosta-90B + नई Hangor-class AIP |
| सबसे अहम ताकत | SSBN + आधुनिक Kalvari-class | संख्या + nuclear submarines + AIP fleet | AIP-based sea denial |
| मुख्य भूमिका | Sea denial, ASW/anti-ship warfare + nuclear deterrence | Sea control/denial, ASW, anti-ship, land attack + nuclear deterrence | मुख्यतः sea denial, anti-ship और ASW |
| नई क्षमता का प्रमुख कार्यक्रम | Project 75(I): 6 AIP submarines | लगातार submarine fleet expansion | 8 Hangor-class |
| भारत के लिए मुख्य बात | संख्या और ageing conventional fleet की चुनौती | सबसे बड़ा regional underwater fleet | छोटा fleet, लेकिन Chinese AIP boats से तेजी से modernization |
अब नजर किस पर ?
प्रोजेक्ट को लेकर फिलहाल पूरी नजर भारत की ओर से अंतिम मंजूरी पर रहेगी। 23 सितंबर को जर्मनी के बयान ने Project 75(I) को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। असली अपडेट यह है कि जर्मनी समझौते के लिए तैयार है और अब भारत की शेष आंतरिक प्रक्रिया निर्णायक चरण में है।








