- भारत अभी तक 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट नहीं बना पाया है।
- इंडियन एयरफोर्स में अभी तक 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट नहीं हैं।
- AMCA प्रोग्राम का भविष्य साफ नज़र नहीं आ रहा है।
- 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट प्रोग्राम में भारत बहुत पीछे है।
6th फाइटर जेट प्रोग्राम में पार्टनर बनने की कोशिश
भारत ने यूरोप के 6वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम (FCAS या GCAP) में शामिल होने की संभावना जताई है। यह कदम भारतीय वायुसेना (IAF) को भविष्य की हवाई युद्ध तकनीकों तक पहुँच दिला सकता है, लेकिन सवाल यह है कि जब भारत अभी तक 5वीं पीढ़ी का विमान न तो बना पाया है और न ही इस्तेमाल कर रहा है, तो सीधे 6वीं पीढ़ी में छलांग लगाना कितना व्यावहारिक होगा। भारतीय रक्षा मंत्रालय (MoD) ने संसदीय स्थायी समिति को बताया है कि IAF यूरोप के दो बड़े कंसोर्टिया में से किसी एक के साथ साझेदारी पर विचार कर रहा है। पहला कंसोर्टियम GCAP (Global Combat Air Programme) जबकि दूसरा कंसोर्टियम है FCAS (Future Combat Air System)। GCAP और FCAS यूरोप और सहयोगी देशों के दो अलग-अलग 6वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम हैं। दोनों का लक्ष्य 2035–2040 तक अगली पीढ़ी के फाइटर जेट्स को सेवा में लाना है।
Global Combat Air Programme (GCAP)
- GCAP की घोषणा दिसंबर 2022 में हुई थी।
- इसमें UK, Italy और Japan शामिल हैं।
- इसका उद्देश्य एक 6th-generation multirole fighter jet बनाना है जो लंबी दूरी तक ऑपरेट कर सके और नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध में “क्वार्टरबैक” की तरह काम करे।
- शामिल देश United Kingdom, Italy और Japan
तकनीकी विशेषताएँ
- विकसित हो रहा विमान BAE Systems Tempest और जापान का Mitsubishi F-X डिज़ाइन पर आधारित है।
- इसमें AI आधारित सिस्टम, advanced sensors, electronic warfare, और human-unmanned teaming शामिल होंगे।
- पहला फ्लाइट-टेस्ट एयरक्राफ्ट 2026 में और Tempest Combat Air Demonstrator 2027 में उड़ान भरने की उम्मीद है।
निवेश और लागत
UK ने अकेले ही £2 बिलियन (लगभग ₹20,000 करोड़) से अधिक का शुरुआती निवेश किया है। जापान और इटली भी समान स्तर पर निवेश कर रहे हैं। कुल लागत सैकड़ों अरब डॉलर तक जा सकती है क्योंकि इसमें fighter jets के साथ-साथ drones, sensors और combat cloud भी शामिल होंगे।
Future Combat Air System (FCAS)
- FCAS की घोषणा 2017 में हुई थी।
- इसमें France, Germany और Spain शामिल हैं।
- इसका लक्ष्य एक Next Generation Weapon System (NGWS) बनाना है जिसमें fighter jets, drones और combat cloud एक साथ काम करेंगे।
तकनीकी विशेषताएँ
- FCAS को एक “system of systems” कहा जाता है।
- इसमें New Generation Fighter (NGF) होगा जो Remote Carriers (UCAVs/drones) के साथ मिलकर काम करेगा।
- सभी प्लेटफॉर्म्स को Combat Cloud से जोड़ा जाएगा ताकि real-time data sharing और AI-driven decision making संभव हो सके।
- यह सिस्टम space, air, ground, sea और cyber domain को जोड़कर multi-domain operations करेगा।
निवेश और लागत
शुरुआती निवेश €100 बिलियन (लगभग ₹9 लाख करोड़) तक अनुमानित है। Airbus और Dassault Aviation इस प्रोजेक्ट के प्रमुख उद्योग साझेदार हैं। 2030 तक प्रोटोटाइप और 2040 तक operational deployment का लक्ष्य है।

भारत की तरफ से आधिकारिक बयान क्या है ?
संसदीय स्थायी समिति को दिए रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत इन कार्यक्रमों में शामिल होने पर विचार कर रहा है ताकि भविष्य की हवाई युद्ध क्षमता में पीछे न रह जाए। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने भी संकेत दिया है कि भारत इन साझेदारियों को गंभीरता से देख रहा है।
भारत को संभावित फायदे
- तकनीकी लाभ – AI-आधारित युद्ध प्रणाली, नेक्स्ट-जेन सेंसर, और मानव-मानवरहित टीमिंग जैसी तकनीकों तक पहुँच।
- औद्योगिक सहयोग – यूरोपीय कंपनियों के साथ साझेदारी से भारत की रक्षा उद्योग को नई दिशा मिलेगी।
- रणनीतिक संतुलन – चीन और पाकिस्तान की बढ़ती हवाई शक्ति के बीच भारत को तकनीकी बढ़त मिल सकती है।
- दीर्घकालिक लाभ – यदि भारत 2035-2040 तक इन विमानों की तैनाती में शामिल होता है, तो IAF की क्षमता विश्वस्तरीय हो जाएगी।
भारत के सामने कितनी बड़ी चुनौती ?
भारत अभी तक 5वीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान (जैसे F-35, Su-57) न तो बना पाया है और न ही खरीदा है। AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) प्रोजेक्ट अभी डिजाइन चरण में है और 2035 से पहले इसके तैयार होने की संभावना कम है। सीधे 6वीं पीढ़ी में छलांग लगाने से तकनीकी निर्भरता बढ़ सकती है। मिलिट्री एविएशन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भारत को 5वीं पीढ़ी के विमान पर काम जारी रखते हुए 6वीं पीढ़ी में साझेदारी करनी चाहिए। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम भारत को “टेक्नोलॉजी लीपफ्रॉग” करने का मौका देगा, लेकिन जोखिम यह है कि भारत यूरोपीय देशों पर अत्यधिक निर्भर हो जाएगा। अन्य विश्लेषकों का मानना है कि भारत को पहले AMCA को सफल बनाना चाहिए, ताकि घरेलू उद्योग मजबूत हो और फिर 6वीं पीढ़ी में साझेदारी से वास्तविक लाभ मिल सके।
कब तक फायदा मिलने की उम्मीद ?
यूरोपीय कार्यक्रमों का लक्ष्य 2035-2040 तक 6वीं पीढ़ी के विमान को सेवा में लाना है। यदि भारत अभी शामिल होता है, तो उसे शुरुआती तकनीकी सहयोग और औद्योगिक साझेदारी का लाभ मिलेगा। वास्तविक तैनाती और लाभ कम से कम 10-15 साल बाद ही दिखेगा। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भारत का यूरोपीय 6वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम में शामिल होना एक रणनीतिक छलांग है। यह कदम भारत को भविष्य की तकनीकों तक पहुँच दिला सकता है, लेकिन साथ ही यह जोखिम भी है कि घरेलू 5वीं पीढ़ी का AMCA प्रोजेक्ट पीछे छूट जाए। यह फैसला भारत को भविष्य में हवाई शक्ति के मामले में वैश्विक अग्रणी बना सकता है, लेकिन इसके लिए धैर्य, निवेश और संतुलित रणनीति की आवश्यकता होगी।







